नदियों को जोड़ना (आई.एल.आर.) सुप्रीम कोर्ट में

14 अगस्त 2002 को भारत के माननीय राष्ट्रपति के भाषणमेंनदियों के अंतर्योजन की आवश्यकता परबलदियागया और उपयुक्त निर्देशों की स्थापना के लिए कहा गया। उस भाषण का उदाहरणदेते हुए श्री रंजीत कुमार, वरिष्ठ वकील (निष्पक्ष सलाहकार) द्वारा सितंबर, 2002 के दौरान “और शांतबहरहीहैमैली यमुना’’शीर्षकसेजनहित याचिका 724/1994 दायर की गई थी।सुप्रीम कोर्ट ने इस मुद्दे को 2002 के एक स्वतंत्र जनहित याचिका(ज.हि.या) प्रादेश याचिका (सिविल) संख्या 512के रूप में माननेका निर्देश दिया, जिसका उद्देश्य शीर्षक था “नदियों की नेटवर्किंग” और केंद्र एवं राज्य सरकारों को इसका उत्तर देने का निर्देश ज़ारी किया।31 अक्टूबर, 2002 की उपरोक्त जनहित याचिका के मामले में न्यायालय ने निम्न आदेश ज़ारी किया:

नदियों के अंतर्योजन के संबंध में इस न्यायालय द्वारा सभी राज्यों और संघ राज्य क्षेत्रों को जारी सूचना के अनुसरण मेंभारत संघ और तमिलनाडु राज्य सरकार द्वारा एक शपथ पत्र दायर किया गया है। किसी अन्य राज्य या संघ राज्य क्षेत्र ने कोई शपथ पत्रदायर नहीं किया और अतः, स्पष्ट रूप से यह अनुमान लगाया जा सकता है की वे प्रदेश याचिका में शामिल प्रार्थना का विरोध नहीं करते हैं और यह समझा जाना चाहिए कि वे सभी इस बात से सहमत हैं कि भारत में नदियों को जोड़ा जाना चाहिए।

भारत संघ की ओर से दायर प्रति-शपथ पत्र में अन्य बातों के साथ यह कहा गया है कि राव समिति की रिपोर्ट प्राप्त होने के बाद, भारत सरकार दो दशकों से अधिक समय से नदियों को आपस में जोड़ने के विषय पर योजना और अध्ययन कर रही है। इस शपथ पत्र में यह भी उल्लेख किया गया है कि जल संसाधन मंत्रालय ने 5 अक्टूबर 2002 को प्रधान मंत्री के समक्ष नदियों के अंतर्योजन के विषय में प्रस्तुतीकरण पेश किया है और उस प्रस्तुतीकरण में उप प्रधान मंत्री और अन्य वरिष्ठ मंत्रीगण और अधिकारी भी उपस्थित थे।

यह सुझाव दिया गया था कि राज्यों के बीच आम सहमति हासिल करने के लिए एक उच्च स्तरीय कार्यबल का गठन किया जा सकता है जो इसकी रूपरेखा का विवरण प्रदान करेगा। इसशपथ पत्रमें आगे यह भी कहा गया है कि 16 अक्टूबर, 2002 को भारत के राष्ट्रपति के समक्ष भी यहप्रस्तुतीकरण पेश किया गया था, जिससे इस परियोजना में भारत के राष्ट्रपति की रूचि भी झलकती है और यह स्वतंत्रता दिवस की पूर्व संध्या कोउनके द्वारा राष्ट्र को किए गए प्रसारण के संबोधन में भी है,जिसमेनदियों के अंतर्योजन पर बल दिया गया था और जिससे यह याचिका दायर करने की वजह मिली है।

अनुभवी महाधिवक्ताने कहा है कि भारत संघ के शपथ पत्र में निर्देशन अनुसारअब तक एक उच्च अधिकार कार्य बल का गठन नहीं किया गया है और सुनवाई की अगली तारीख तक कथित कार्यबल के गठन और कथित कार्यबल के निर्णय के संबंध में इस न्यायालय को सूचना प्रदान करने में सक्षम होने चाहिए।भारत संघ ने नदियों के अंतर्योजन की अवधारणा को स्वीकार कर लिया है और शपथ पत्र में लाभों की घोषणा है जो यह सुनिश्चित करेगा किपरियोजनाकाकार्यपूर्णहोचुकाहै।
 

तमिलनाडु राज्य हीएकमात्र ऐसा राज्य है जिसने इस न्यायालय द्वारा जारी सूचना का उत्तर दिया और एक शपथ पत्र दायर किया। तमिलनाडु राज्य ने भी नदियों के अंतर्योजन का समर्थन किया है और अपनेशपथ पत्र में प्रार्थना की है कि भारत संघ को एक उच्च स्तरीय समिति का गठन करने का निर्देश जारी किया जाए ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि परियोजना समयसेपूरी हो सके। शपथ पत्र सहित राष्ट्रीय जल विकास अभिकरण द्वारा मई 2000 में तैयार की गई अंतर-जलाशय जल अंतरण प्रस्तावों के क्रियान्वयन की संभावित योजना भी प्रस्तुत की गई है। हमें यह देख कर दुःख हुआ कि अभिकरण के रिपोर्ट में सूचित परिप्रेक्ष्य योजना का मील पत्थर यह दर्शाता है कि हालांकि प्रायद्वीपीय और हिमालयी परियोजनाओं के संबंध में पूर्व-संभाव्यता रिपोर्ट पहले ही पूरी हो चुकी हैं, फिर भी प्रायद्वीपीय लिंक परियोजना के संबंध में लिंक परियोजनाओं की समाप्ति वर्ष 2035 तक होगी औरहिमालय लिंक परियोजना के संबंध में लिंक परियोजनाओं की समाप्ति वर्ष2043तक होगी।

यह विश्वास करना मुश्किल है कि ऐसे देश में जहाँ सभी संसाधन मौजूद हैं वहाँ पर परियोजना पूरा होने में 43 वर्षों का विलंब होगा जबकि इस परियोजना से किसी भी राज्य को कोई आपत्ति नहीं है और जिसकी आवश्यकता और वांछनीयता को भारत संघ ने भी पहचाना है और स्वीकार किया है। इस परियोजना से केवल सूखाग्रस्त क्षेत्रों को ही राहत नहीं मिलेगीबल्कि यह एक अत्यंत प्रभावकारी बाढ़ नियंत्रण उपाय होगा और भारत सरकार एवं राज्यों द्वारा उचित रूप से प्रचारित जल संचयन का भी एक रूप होगा।


अनुभवी महाधिवक्ता ने कहा है कि एक अधिक यथार्थवादी दृष्टिकोण अपनाया जाएगा और परियोजना की समाप्तिका एक संशोधित कार्यक्रम तैयार किया जाए और न्यायालय में प्रस्तुत किया जाए। हम उम्मीद करते हैं कि कार्यक्रम तैयार करते समय यह कोशिश की जाएगी कि अधिकतम दस वर्षों के समय के अंदर ये लिंक परियोजनाएं पूरी हो जाए। हम ऐसा इसलिए कह रहे हैं क्योंकि हाल ही में राष्ट्रीय राजमार्ग परियोजनाएं शुरू की गई हैं और यह पूरी होने वाली है और नदियों के अंतर्योजनसेराजमार्ग और जलमार्गदोनोंएकदूसरेकेपूरकसिद्धहोंगे।जो सम्पूर्ण देश के लिए अत्यंत लाभकारी होगा।
 

राष्ट्रीय जल विकास अभिकरण की रिपोर्ट में समझौते और सहमति पर हस्ताक्षर का सन्दर्भ है।भारत संघ द्वारा इस पहलू को भी तब बदला गया जब उनकेशपथ पत्र में यह उल्लेख किया गया कि नदियों के अंतर्योजन से प्रभावित सभी राज्यों की सहमति प्राप्त की जानी होगी। अनुभवी महाधिवक्ता इस पहलू पर विचार करना चाहेंगेक्योंकि श्री रणजीत कुमार ने दावा किया है कि यदि संविधान की सूची I के प्रविष्टि 56 के तहत एक कानून बनाया जाता है, तो सहमति प्राप्त करने की आवश्यकता नहीं होगी और केंद्र सरकार इस स्थिति में होगीकी वह परियोजना निष्पादन की जिम्मेदारी ले सकेगी और उचित समय-अवधि के भीतर इसे पूरा कर सकेगी।

यह न्यायालय कानून निर्माण हेतु संसद को कोई निर्देश ज़ारी करने का अधिकार नहीं रखता है किन्तु महाधिवक्ता ने यह कहा है कि सरकार इस पहलू पर विचार करेगी और परामर्श अनुसार उपयुक्त कानून का गठन करेगी।

श्री रणजीत कुमार, विद्धानअमीकसक्यूरीने हमारा ध्यान संसद द्वारा लागू किए गए नदी बोर्ड अधिनियम, 1956 के तरफ आकर्षित किया है। अनुभवी महाधिवक्ता इस बात पर विचार करेंगे कि नदियों के अंतर्योजन के लिए क्या किसी अतिरिक्त कानून की आवश्यकता है या नहीं।

कथित परियोजना के संबंध में कोई भी पक्ष न्यायलय में अध्ययन समाविष्ट कोई भी रिपोर्ट यादस्तावेज दायर करने के प्रति स्वतंत्र हैं। अगली सुनवाई के लिए 16 दिसंबर, 2002 को आने का निर्देश दिया।

16 दिसंबर, 2002 के मंत्रणा की सुनवाई के बाद, न्यायालय ने निम्न आदेश ज़ारी किया:

अनुभवी महाधिवक्ता नेजल संसाधन मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा पारित दिनांक13.12.2002प्रस्ताव की ओर हमारा ध्यान आकर्षित किया, जिसमें अन्य बातों के साथ यह कहा गया है कि संभाव्यता रिपोर्ट की तैयारी के लिए विस्तृत अध्ययन और अन्वेषण करने के पश्चात राष्ट्रीय जल विकास अभिकरण ने 30 लिंकों की पहचान की है और ऐसे छह लिंकों की संभाव्यता रिपोर्ट तैयार की है। यह भी देखा गया है कि कई जलाशय राज्यों ने कथित अभिकरण द्वारा निष्पादित अध्ययन और निर्मित संभाव्यता रिपोर्ट के बारे में अलग-अलग विचार व्यक्त किए हैं और राज्यों के बीच एक आम सहमति बनाने और परियोजना के वित्तपोषण आदि के रूपरेखा और व्यक्तिगत परियोजनाओं के मूल्यांकन के नियमों पर मार्गदर्शन प्रदान करने के लिए केंद्र सरकार ने एक कार्य बल संस्थापित किया है, जिसका विवरण प्रस्ताव के अनुच्छेद 3 और 4 में दिया गया है। अनुच्छेद 5 मेंकथित कार्य बल के विचारणीय विषय हैं और अनुच्छेद 8 में वर्ष 2016 के अंत तक नदियों के अंतर्योजन के लक्ष्य की समय सारणी उल्लिखित है।श्रीमान रणजीत कुमार, विद्धानअमीकसक्यूरीने इस विषय में उत्तर दायर करने के लिए कुछ समय के लिएस्थगन की प्रार्थना करते हैं। अगली सुनवाई 20 जनवरी, 2003 को थी।

20 जनवरी, 2003 के मंत्रणा की सुनवाई के बाद, न्यायालय ने निम्न आदेश ज़ारी किया: यदि इस मामले को लगभग तीन महीने तक स्थगित किया जाता है, तो यह उचित रहेगा क्योंकि न्यायालय को यह ज्ञात हो सकेगा कि इस मामले में क्या प्रगति हुई है। इस मामले की अगली सुनवाई मई, 2003 के प्रथम सप्ताह में थी।

5 मई, 2003 को यह मुकदमा सुनने के बाद, माननीय सुप्रीम कोर्ट ने निम्न निर्देश ज़ारी किए:

दिनांक20 जनवरी, 2003 के आदेश के अनुसरण में दिनांक5 मई, 2003कोएक शपथ पत्र बनाया गया है।